शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

1. अहसास
तुम चले गये बहुत दूर।
फिर भी नजर आते हो।
वहीं पर,जहाँ रोज मिलते थे।
तुम्हारा मौन आमंत्रण, और बेचैनी मेरे लिए।
शायद हम न मिलें फिर कभी *****
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फिर भी मैं आऊंगा तुम्हारे पास ।
पूस की रात में जब कभी,
तुम्हें अहसास होगा गर्माहट का।
वो तपन मेरी ही होगी।
जून की तपती दुपहरी में जब कभी,
आँखें बंद कर बैठोगे।
मैं मिलूंगा तुम्हें बन्द पलकों में।
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मैं आऊँगा सुबह की ठंडी बयार के साथ।
तुम्हारे चेहरे पर लटें हिलेंगी,
तुम्हें अहसास होगा सुर्ख गालों पर
मेरे स्पर्श का ।
इसी प्रकार जीवित रहेगा
तुम्हारा अहसास भी मेरे अंदर
मेरी अधूरी बेचैन कविता में।
........ गंभीर सिंह